प्रसंशा चाहे कितनी भी करिये परन्तु अपमान बहुत  सोच समझ कर करना चाहिए, क्योंकि  अपमान ऐसा ऋण है जो हर  कोई अवसर मिलने पर ब्याज सहित  अवश्य चुकता है.