आईना क्यूँ न दूँ कि तमाशा कहें जिसे ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे …
एक जा हर्फ़-ए-वफ़ा लिक्खा था सो भी मिट गया ज़ाहिरन काग़ज़ तिरे ख़त का गलत-बर-दार है…
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