रात कितनी गुज़र गई लेकिन,इतनी हिम्मत नहीं कि घर जाएँ - नासिर काज़िम

शहर सुनसान है किधर जाएँ
ख़ाक हो कर कहीं बिखर जाएँ

रात कितनी गुज़र गई लेकिन
इतनी हिम्मत नहीं कि घर जाएँ

यूँ तिरे ध्यान से लरज़ता हूँ
जैसे पत्ते हवा से डर जाएँ

उन उजालों की धुन में फिरता हूँ
छब दिखाते ही जो गुज़र जाएँ

रैन अँधेरी है और किनारा दूर
चाँद निकले तो पार उतर जाएँ ...

- नासिर काज़िम -

Shehar sunsaan hain kidhar jaayen
Khaak ho kar kahin bikhar jaayen

Raat kitni guzar gai lekin
Itni himmat nahin ki ghar jaayen

Yun tere dhyaan se larazta hun
jaise patte hawa se dar jaayen

Un ujaalon ki dhun me firta hun
Chabb dikhate hi jo guzar jaayen

Rain andheri hai aur kinara door
Chaand nikle to paar utar jaayen

- Naasir Kaazim -
रात कितनी गुज़र गई लेकिन,इतनी हिम्मत नहीं कि घर जाएँ - नासिर काज़िम रात कितनी गुज़र गई लेकिन,इतनी हिम्मत नहीं कि घर जाएँ - नासिर काज़िम Reviewed by Bhopali2much on May 04, 2017 Rating: 5
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