क्या अजब रात थी, क्या गज़ब रात थी दंश सहते रहे, मुस्कुराते रहे देह की उर्मियाँ…
मांग की सिंदूर रेखा, तुमसे ये पूछेगी कल, यूँ मुझे सर पर सजाने का तुम्हे अधिकार क्य…
कुछ छोटे सपनों की ख़ातिर बड़ी नींद का सौदा करने निकल पड़े हैं पाँव अभागे …
ये तेरी बेरुखी की हमपे आदत खास टूटेगी कोई दरिया न ये समझे की मेरी प्यास टूटेगी तेरे वा…
मिले हर जख्म को ,मुस्कान से सीना नहीं आया अमरता चाहते थे पर, जहर पीना नहीं आया तुम्हार…
ग़मों को आबरू अपनी ख़ुशी को गम समझते हैं जिन्हें कोई नहीं समझा उन्हें बस हम समझते हैं कश…
अ भी चलता हूँ रस्ते को मैं मंजिल मान लू कैसे मसीहा दिल को अपनी जिद का कातिल मन लूँ कैस…
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