मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर, लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया - मजरूह सुल्तानपुरी - Bhopali2Much

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Wednesday, 24 May 2017

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर, लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया - मजरूह सुल्तानपुरी




जब हुआ इरफ़ाँ तो ग़म आराम-ए-जाँ बनता गया 
सोज़-ए-जानाँ दिल में सोज़-ए-दीगराँ बनता गया 

रफ़्ता रफ़्ता मुंक़लिब होती गई रस्म-ए-चमन 
धीरे धीरे नग़्मा-ए-दिल भी फ़ुग़ाँ बनता गया 

मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर 
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया 

मैं तो जब जानूँ कि भर दे साग़र-ए-हर-ख़ास-ओ-आम 
यूँ तो जो आया वही पीर-ए-मुग़ाँ बनता गया 

जिस तरफ़ भी चल पड़े हम आबला-पायान-ए-शौक़ 
ख़ार से गुल और गुल से गुलसिताँ बनता गया 

शरह-ए-ग़म तो मुख़्तसर होती गई उस के हुज़ूर 
लफ़्ज़ जो मुँह से न निकला दास्ताँ बनता गया 

दहर में 'मजरूह' कोई जावेदाँ मज़मूँ कहाँ 
मैं जिसे छूता गया वो जावेदाँ बनता गया 

 - मजरूह सुल्तानपुरी -


jab huā irfāñ to ġham ārām-e-jāñ bantā gayā 
soz-e-jānāñ dil meñ soz-e-dīgarāñ bantā gayā

rafta rafta munqalib hotī ga.ī rasm-e-chaman 
dhīre dhīre naġhma-e-dil bhī fuġhāñ bantā gayā 

maiñ akelā hī chalā thā jānib-e-manzil magar 
log saath aate ga.e aur kārvāñ bantā gayā 

maiñ to jab jānūñ ki bhar de sāġhar-e-har-ḳhās-o-ām 
yuuñ to jo aayā vahī pīr-e-muġhāñ bantā gayā 

jis taraf bhī chal paḌe ham ābla-pāyān-e-shauq 
ḳhaar se gul aur gul se gulsitāñ bantā gayā 

sharh-e-ġham to muḳhtasar hotī ga.ī us ke huzūr 
lafz jo muñh se na niklā dāstāñ bantā gayā 

dahr meñ 'majrūh' koī jāvedāñ mazmūñ kahāñ 
maiñ jise chhūtā gayā vo jāvedāñ bantā gayā 

- Majrooh Sultanpuri -