मैंने ख़ुद में रच लिए कुछ ख़ुशनुमा मंज़र - डॉ. कुमार विश्वास



इक सदा पैग़ाम देती फिर रही दर-दर,
चुप्पियों से भी बड़ा है चुप्पियों का डर.
रोज़ मौसम की शरारत झेलता कब तक,
मैंने ख़ुद में रच लिए कुछ ख़ुशनुमा मंज़र..!

- डॉ. कुमार विश्वास

Ik sadaa paigaam deti fir rahi dar-dar,
Chuppiyon se bhi bada hau, Chuppiyon ka dar.
Roz mausam ki shararat jhelta kab tak,
Maine khud me rach liye kuch khushnuma manzar.

- Dr. Kumar Vishwas
मैंने ख़ुद में रच लिए कुछ ख़ुशनुमा मंज़र - डॉ. कुमार विश्वास मैंने ख़ुद में रच लिए कुछ ख़ुशनुमा मंज़र - डॉ. कुमार विश्वास Reviewed by Bhopali2much on March 09, 2017 Rating: 5
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