ज़िंदगी मौत के पहलू में भली लगती है, घास इस क़ब्र पे कुछ और हरी लगती है - सलीम अहमद





ज़िंदगी मौत के पहलू में भली लगती है 
घास इस क़ब्र पे कुछ और हरी लगती है 

रोज़ काग़ज़ पे बनाता हूँ मैं क़दमों के नुक़ूश 
कोई चलता नहीं और हम-सफ़री लगती है 

आँख मानूस-ए-तमाशा नहीं होने पाती 
कैसी सूरत है कि हर रोज़ नई लगती है 

घास में जज़्ब हुए होंगे ज़मीं के आँसू 
पाँव रखता हूँ तो हल्की सी नमी लगती है 

सच तो कह दूँ मगर इस दौर के इंसानों को 
बात जो दिल से निकलती है बुरी लगती है 

मेरे शीशे में उतर आई है जो शाम-ए-फ़िराक़ 
वो किसी शहर-ए-निगाराँ की परी लगती है 

बूँद भर अश्क भी टपका न किसी के ग़म में 
आज हर आँख कोई अब्र-ए-तही लगती है 

शोर-ए-तिफ़्लाँ भी नहीं है न रक़ीबों का हुजूम 
लौट आओ ये कोई और गली लगती है 

घर में कुछ कम है ये एहसास भी होता है 'सलीम
ये भी खुलता नहीं किस शय की कमी लगती है 

- सलीम अहमद -


zindagī maut ke pahlū meñ bhalī lagtī hai 
ghaas is qabr pe kuchh aur harī lagtī hai 

roz kāġhaz pe banātā huuñ maiñ qadmoñ ke nuqūsh 
koī chaltā nahīñ aur ham-safarī lagtī hai 

aañkh mānūs-e-tamāshā nahīñ hone paatī 
kaisī sūrat hai ki har roz na.ī lagtī hai 

ghaas meñ jazb hue hoñge zamīñ ke aañsū 
paañv rakhtā huuñ to halkī sī namī lagtī hai 

sach to kah duuñ magar is daur ke insānoñ ko 
baat jo dil se nikaltī hai burī lagtī hai 

mere shīshe meñ utar aa.ī hai jo shām-e-firāq 
vo kisī shahr-e-nigārāñ kī parī lagtī hai 

buuñd bhar ashk bhī Tapkā na kisī ke ġham meñ 
aaj har aañkh koī abr-e-tahī lagtī hai 

shor-e-tiflāñ bhī nahīñ hai na raqīboñ kā hujūm 
lauT aao ye koī aur galī lagtī hai 

ghar meñ kuchh kam hai ye ehsās bhī hotā hai 'salīm' 
ye bhī khultā nahīñ kis shai kī kamī lagtī hai 

- Saleem Ahmed -
ज़िंदगी मौत के पहलू में भली लगती है, घास इस क़ब्र पे कुछ और हरी लगती है - सलीम अहमद ज़िंदगी मौत के पहलू में भली लगती है, घास इस क़ब्र पे कुछ और हरी लगती है - सलीम अहमद Reviewed by Bhopali2much on May 19, 2017 Rating: 5
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